डीसी और मंत्री के बेटे के साथ एक बेंच पर बैठ कर जब रिक्शा चालक के बेटे को भी पढ़ने की सुविधा होगी तभी देश में शिक्षा में सुधार हो पाएगा : बिजय चौरसिया
डीसी के बेटे के साथ जब रिक्शा चालक का भी बेटा एक बेंच पर बैठकर पढ़ेगा तभी होगा शिक्षा में सुधार : बिजय चौरसिया
*लोग अपने-अपने मकसद से धरना प्रदर्शन कर रहे हैं, सुधार से किसी को कोई मतलब नहीं है।*
*मांग इसकी हो कि मंत्री, सांसद, विधायक, डीसी, एसपी, बीडीओ, दरोगा के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करे ऐसा कानून बनाए राज्य और केंद्र सरकार*
भाजपा के झारखंड प्रदेश प्रवक्ता बिजय चौरसिया ने बुधवार को प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि लोग धरना, प्रदर्शन, अनशन अपने अपने मकसद से कर रहे हैं किसी को मूल सुधार से मतलब नहीं है। बताया देश आजादी के बाद शुरुआत से हीं इस देश की शिक्षा नीति में बदलाव की आवश्यकता रही है। शुरू से यहां अमीरों के बच्चों के लिए अलग और गरीबों के बच्चों के लिए अलग शिक्षा रही है। बताया जब तक देश के संपन्न लोगों के बच्चों के संग गरीब के बच्चे नहीं पढ़ पाएंगे देश की शिक्षा में कोई सुधार नहीं हो सकता। अमीरों के बच्चों और गरीबों के बच्चों की शिक्षा में बहुत बड़ी खाई है। इसे पाटना होगा। बताया पूरी व्यवस्था ऐसी है कि दरोगा का बेटा हीं दरोगा बने, डीसी का बेटा ही डीसी बने और मजदूर का बेटा मजदूर ही बनकर रह जाए। बताया ये अलग बात है कि ईश्वरीय कृपा, विद्यार्थी की खुद की मेहनत से कोई गरीब का बेटा भी ऊंचे पद पर चला जाता है नहीं तो ये व्यवस्था पूरा इंतजाम ऐसा की है कि कोई ग़रीब का बच्चा ऊँचे पदों पर जा ही न सके। बताया आप इसे एक उदाहरण से समझिए कि गरीब के बच्चों के लिए कहां कहां बैरियर लगा कर रखा गया है : किसी भी सिविल सेवा व अन्य उँचे पदों के लिए जब परीक्षा होती है तो दोनों तरह के विद्यार्थियों के लिए एक जैसी व्यवस्था होती है, अमीरों के बच्चे जहां लग्जरियस बड़े-बड़े कान्वेंट में शिक्षा ग्रहण कर, बड़े-बड़े कोचिंग संस्थानों में तैयारी कर उस परीक्षा में बैठता है, दूसरा गरीब के बच्चे टूटे फूटे, अव्यवस्थित सरकारी विद्यालयों में बगैर किसी ट्यूशन और कोचिंग के उस परीक्षा में बैठता है। उस परीक्षा का सिलेबस, उसके प्रश्न पत्र भी वही प्रभावशाली बच्चों के बाप दादा ही तय करते हैं। उसके रिजल्ट भी वही जारी करते हैं और इतना करने के बाद भी जब उसे लगता है कि उसका बच्चा शायद सफलता से चूक जाए तो पैसे के दम पर पूरा सिस्टम को खरीद कर अपने नाकाबिल बच्चे के माथे पर सफलता का सेहरा खरीद कर बांध देता है। श्री चौरसिया ने कहा कि अगर पूरे सिस्टम को समझा जाए तो सच्चाई आँखें खोल देगी, रूह काँप जाएगा कि आजादी के बाद से हीं कैसा षडयंत्र इस देश में चलता आ रहा है। कहा यदि सचमुच शिक्षा में सुधार करना है, समानता लानी है तो इसकी शुरुआत जड़ से करनी होगी। ऊपर टहनी में जल डालने के ढोंग से बाहर निकलना होगा। नहीं तो ऐसे धरना, प्रदर्शन, अनशन होते रहेंगे, लोग बदलते रहेंगे, इधर के भी उधर के भी और सुधार कभी भी नहीं होगा। कहा प्राथमिक विद्यालयों से इसकी शुरुआत करनी होगी जब किसी प्रखंड के बीडीओ, दरोगा, सीओ का बेटा मजदूर के बेटे के साथ सरकारी विद्यालयों में पढ़ेगा तो सुधार वहीं से होना शुरू हो जाएगा : फिर विद्यालय के एमडीएम में बने खिचड़ी में छिपकलियां निकलना बंद हो जाएगी, फिर शिक्षकों का देर से विद्यालय पहुंचना बंद हो जाएगा, फिर समय से पहले विद्यालय से भागना बंद हो जाएगा, फिर पढ़ाने की मजबूरी होगी, फिर खुद से पढ़ कर आने की मजबूरी होगी। फिर ये दिखावा कर रहे गलाकट कॉन्वेंटों के साम्राज्य पर लगाम लगेगा, फिर ये प्रश्न पत्र बेचते और सफलता की झूठी तसल्ली देते कोचिंग संस्थानों का बाज़ार मंद होगा। आंदोलन इसके लिए होना चाहिए। राज्यों में होना चाहिए, केंद्र में होना चाहिए चूंकि ये कानून अपने अपने राज्यों में राज्य सरकारों को हीं बनानी है। केंद्र की सहमति चाहिए।
लेकिन असली बदलाव की न किसी को कोई फ़िक्र है न हीं कोई तमन्ना है। सबको अपनी टीआरपी चाहिए सबके अपने अपने मकसद हैं छुपे।

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